Wednesday, August 19, 2009

Shakti aur Kshama "शक्ति और क्षमा"

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा,
पर नर-व्याध सुयोधन तुमसे
कह, कहाँ कब हारा।

क्षमाशील हो रिपु समक्ष,
तुम हुए विनीत जितना ही,
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समजा उतना ही,

क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन,
विषरहित, विनीत, सरल हो,

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बेठे पढ़ते रहे छंद
अनुनय के प्यारे प्यारे

उतर में जब एक नाद,
भी उठा नही सागर से,
उठी धधक् अधीर पौरुष की,
आग राम के शर से,

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि,
कहता आ गिरा चरण में,
चरण पूज, दासता ग्रहण की,
बंधा मूढ़ बंधन में,
सच पुचो तो शर में ही,
बसती है दीप्ति विनय की,
संधि-वचन संपूज्य उसी का,
जिसमे शक्ति विजय की,

सहनशीलता, क्षमा, दया को,
तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके,
पीछे जब जगमग है।

रामधारी सिंह "दिनकर" Ramdhari Singh Dinkar

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